Friday, August 16, 2019

राजस्थान मेडिकल एजुकेशन विभाग का 26 जून 2019 का आदेश

लेकिन फ़ीस की यह रकम सूबे के प्राइवेट कॉलेजों की एनआरआई सीटों की फ़ीस की तुलना में काफ़ी कम है.
मेडिकल स्टूडेंट इस बात पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि ये वाक़ई एक बढ़िया सौदा है क्योंकि प्राइवेट कॉलेज की तुलना में किसी एनआरआई कोटे वाले छात्र को अब कम पैसे ख़र्च करके सरकारी कॉलेज की डिग्री मिल सकेगी.
पर डॉक्टर नितेश भास्कर इस स्थिति पर अलग तरह से सवाल करते हैं. वो कहते हैं, "अधिक फ़ीस के नाम पर प्रतिभाशाली छात्रों की 15 प्रतिशत सीटें सरकार कैसे छीन सकती है?"
डॉक्टर नितेश 'मेडिकल स्टूडेंट्स कॉर्डिनेशन कमेटी' में अजमेर मेडिकल कॉलेज के प्रतिनिधि हैं.
उनके अनुसार, "सरकार ने पहले सभी छात्रों की फ़ीस बढ़ाई. फिर फ़ीस के नाम पर तैयार किए गए एनआरआई कोटे के तहत 15 प्रतिशत सीटें हड़प लीं. ये वो सरकारी सीटें हैं जो एनईईटी की परीक्षा में बेस्ट रैंक हासिल करने वाले छात्रों के बीच बाँटी जाती थीं."
"कौन नहीं जानता कि देश में मेडिकल कोर्स की सरकारी सीटें सिर्फ़ 30 हज़ार हैं और देश में मेडिकल की सबसे बड़ी परीक्षा, NEET-2019 में पास हुए सभी 8 लाख छात्र इन सीटों को पाने का सपना रखते हैं. लेकिन सरकारी सीटों पर सिर्फ़ वे जा पाते थे जिनका स्कोर बढ़िया हो. चाहें उनके माता-पिता के पास पैसे हों या नहीं. लेकिन सरकार ने इस पैमाने को बदल दिया है."
डॉक्टर नितेश ने कहा, "हमारे राज्य में किसी भी साधारण कोचिंग सेंटर में मेडिकल की तैयारी करने का रेट डेढ़ लाख रुपये है. ग़रीब परिवार भी ये सोचकर बच्चे की कोचिंग पर पैसा ख़र्च कर देते थे कि एक बार सरकारी कॉलेज में दाख़िला हो जायेगा तो डॉक्टरी कर लेगा. लेकिन 15 प्रतिशत सीटें एनआरआई के लिए ब्लॉक होने से प्रतिस्पर्धा तेज़ी से बढ़ेगी या ग़रीब परिवार ये ख़्वाब देखना ही छोड़ देंगे."
मेडिकल स्टूडेंट्स की इसी स्टेट कमेटी में डॉक्टर धर्मेंद्र कुमार भांभू बीकानेर मेडिकल कॉलेज के प्रतिनिधि हैं. धर्मेंद्र बीकानेर के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज की स्टूडेंट यूनियन के निर्वाचित अध्यक्ष भी हैं.
उनका कहना है कि एनआरआई कोटे की वजह से बहुत सारे छात्रों के लिए NEET की रैंक का कोई मतलब नहीं रह गया है.
धर्मेंद्र ने कहा, "हम दो महीने से इसके ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट कर रहे हैं. कॉलेज प्रशासन कहता है कि ये सरकार के स्तर का मुद्दा है, उनके हाथ में कुछ नहीं है. मंत्री इस बारे में बात नहीं करते. जिन पेरेंट्स के पास 70-80 लाख रुपये नहीं हैं, उनके बच्चों की सीट महज़ कुछ नंबरों से छूट रही है. भले ही NEET में उनके 95 परसेंटाइल नंबर आए हैं."
वो कहते हैं, "सब सुविधाओं में जीने वाले उन लोगों के लिए जिनके पास बहुत सारा पैसा है, कोटा निर्धारित करने का क्या मतलब है? फिर कई बच्चों की NEET रैंक बहुत ख़राब है. लेकिन ज़्यादा फ़ीस लेकर उन्हें सरकारी सीट पर दाख़िला दिया जा रहा है क्योंकि एनआरआई कोटे की व्यवस्था है. क्या इसका मतलब ये हुआ कि अगर आप एनआरआई कोटे का सर्टिफ़िकेट बनवाने में सफल हो जाते हैं, तो NEET में न्यूनतम नंबर होने पर भी आप सरकारी सीट के बारे में सोच सकते हैं?"
राजस्थान के मेडिकल एजुकेशन विभाग ने बीबीसी से इस बात की पुष्टि की है कि सूबे की 212 एनआरआई सीटों में से अधिकांश सीटें (200 से ज़्यादा) आवंटित की जा चुकी हैं.
विभाग के अनुसार इनमें वो छात्र भी हैं जिनका NEET स्कोर 50 परसेंटाइल से कम है. यानी ओबीसी और एससी-एसटी श्रेणी के कट-ऑफ़ स्कोर से कम.
मेडिकल एजुकेशन विभाग के एडिश्नल डायरेक्टर सुरेश चंद ने बताया कि सरकार ने जो मौजूदा व्यवस्था बनाई है, उसके अनुसार एनआरआई कोटे की सभी 212 सीटें अगर नहीं भर पाती हैं, तो उन्हें कॉलेज की मैनेजमेंट सीटों में बदल दिया जाएगा. ऐसी स्थिति में सोसायटी से संचालित सरकारी मेडिकल कॉलेज यह तय कर सकेंगे कि वो छात्रों से कितनी फ़ीस लेंगे.
कमेटी में शामिल उदयपुर, जयपुर, बीकानेर, झालावाड़ और जोधपुर के जिन मेडिकल स्टूडेंट्स से हमारी बात हुई, उनका मानना है कि एनआरआई कोटे की शर्तें इतनी ढीली हैं कि उनकी वजह से सिस्टम में धांधली बढ़ सकती है.
मेडिकल स्टूडेंट्स के इस दावे को समझने के लिए हमने राजस्थान मेडिकल एजुकेशन विभाग की वेबसाइट पर मौजूद सरकारी आदेश को पढ़ा जिसमें लिखा है कि एनआरआई कोटे के तहत किसे एनआरआई माना जायेगा:
एनआरआई कोटे के तहत सरकारी मेडिकल सीट हासिल करने की पात्रता का दायरा क्या वाक़ई बहुत बड़ा नहीं है? यह सवाल जब हमने राजस्थान के मेडिकल एजुकेशन मंत्री रघु शर्मा को भेजा तो उन्होंने दस दिन तक लगातार हमें समय दिया और फिर इस विषय पर बात नहीं की.