डॉक्टर मनोज ने कहा, ''कौन किस वक़्त किस तरह से स्क्रीन देख रहा है ये
उनके चुनाव पर निर्भर करता है. फिर चाहे टीवी हो, ऑनलाइन वेबसाइट्स हों या
मोबाइल गेमिंग, जहां एक्शन होता है. लेकिन यही लोग जब नेटफ्लिक्स जैसी जगह
पर जाते हैं तो आराम के लिए जाते हैं.''
दिल्ली में पढ़ाई कर रही मोनिका भी नेटफ्लिक्स देखती हैं.
अपनी दिलचस्पी के बारे में वो कहती हैं, ''जब आप मुझसे बात कर रहे हैं, तब भी मैं 'द पनिशर' देख रही हूं. इन साइट्स में कुछ देखने की सबसे अच्छी बात ये है कि आप एक साथ सारे एपिसोड देख सकते हैं. एचबीओ की सिरीज़ गेम ऑफ थ्रोन्स या टीवी की तरह आपको महीनों तक इंतज़ार नहीं करना होता है. लेकिन पूरी सिरीज़ एक बार में मिल जाने से दर्शकों की जो बेचैनी होती है, वो नहीं होती.''
अक्षय कहते हैं, ''टीवी में अगर कहीं रोने का सीन आने वाला है और माहौल बन रहा है तो टीवी का विज्ञापन उस माहौल को तोड़ देता है. ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स में ऐसा नहीं है.''
अक्षय ने बताया कि अगर सिरीज़ अच्छी है या अवसाद वाले दिन हैं तो 5 से लेकर 10 घंटे तक भी देख साइट्स पर वक़्त गुज़रता है.
बाहर के देशों में ऑनलाइन गेमिंग को मेंटल हेल्थ कंडीशन मान लिया गया है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गेमिंग को डिसॉर्डर माना है. इसमें सिर्फ़ ऑनलाइन वेबसाइट्स ही नहीं, सोशल मीडिया भी शामिल है.
डॉक्टर मनोज बताते हैं कि बाहर के देशों में भारत की तरह इस पर रिसर्च हो रही है.
प्रशासन ने अपनी कोशिशों के सिलसिले में सोमवार को एक और कड़ी जोड़ी है. इस बाघिन के शिकार के लिए केन कोरसो प्रजाति के दो कुत्तों को लगाया गया है. ये कुत्ते शिकारी माने जाते हैं.
ऐसा एक कुत्ता छह लाख रुपए का आता है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक ये दोनों कुत्ते हैदराबाद के शार्पशूटर नवाब शफ़त अली ख़ान के हैं, जो उनके पैलेस के बाड़े में रहते हैं.रिंसिपल चीफ़ कंज़रवेटर ऑफ़ फ़ॉरेस्ट (वाइल्डलाइफ़) ए के मिश्रा ने टाइम्स से कहा, ''काफ़ी विचार-विमर्श के बाद केन कोरसो कुत्तों को फ़ील्ड में लगाया गया है. गोल्फ़र और डॉग ट्रेनर ज्योति रंधावा इन कुत्तों को संभाल रहे हैं. नवाब के बेटे असगर समेत कुछ और लोग भी इस ऑपरेशन में शामिल हैं.''
अधिकारियों का कहना है कि बाघिन दो घोड़ों को मार चुकी है, लेकिन वो 'चारे' के क़रीब नहीं गई. इसके अलावा कैमरा ट्रैप में भी उसकी तस्वीरें नहीं आ रहीं. उसे बेहोश करने के लिए पहले बाघिन की लोकेशन का पता करना ज़रूरी है और कुत्ते उसे खोज निकालने में काफ़ी मदद दे सकते हैं.
लेकिन वो कुत्ता कौन-सा है, जिसे बाघिन या बाघ के सामने उतारा जा रहा है. क्या कुत्तों की सारी प्रजातियां इतनी दमदार हैं कि उन्हें टाइगर से भिड़ाया जा सकता है. ये केन कोरसो कहां से आए हैं और इतने बहादुर कैसे हैं?
केन कोरसो का नाम कहां से आया? केन का मतलब है कुत्ता और लातिन भाषा में कोरसो के मायने हैं सुरक्षा करने वाला या प्रोटेक्टर. इसे इटैलियन मास्टिफ़ भी कहा जाता है. इटली में ये कई साल से गार्ड डॉग की भूमिका निभा रहा है.
केन कोरसो को संपत्ति, पशुओं और परिवारों की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है और आज भी कई इलाकों में ये जारी है. इतिहास को देखें तो ये नाइट वॉचमेन की भूमिका निभाते रहे हैं.
अमेरिकन केनेल क्लब ल 1994 में इस प्रजाति को इटैलियन केनल क्लब ने इतालवी कुत्तों की 14वीं प्रजाति के रूप में मान्यता दे दी है. साल 1997 में वर्ल्ड केनाइन ऑर्गेनाइज़ेशन ने इसे आंशिक रूप से स्वीकार किया था और दस साल बाद इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह मान्यता दे दी गई.
अमरीका में अमरीकन केनेल क्लब ने पहले साल 2010 में केन कोरसो को मान्यता दी थी. इस प्रजाति की शोहरत लगातार बढ़ रही है और दुनिया के कई देशों में इसे पुलिस डॉग के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है.
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के मुताबिक इन कुत्तों का कद 25 से 28 इंच होता है और जीवनकाल 9-12 साल. इन कुत्तों का वज़न 45-50 किलोग्राम तक होता है.
इन कुत्तों को स्मार्ट, ट्रेनिंग देने के योग्य, दबंग और आत्मविश्वास से भरा हुआ बताया जाता है. केन कोरसो का इतिहास रोमन दौर से जुड़ा है. इसका सिर काफ़ी बढ़ा होता है
20वीं सदी में दक्षिणी इटली के ग्रामीण फ़ार्म में जब जीवन में बदलाव हुआ तो कोरसो दुर्लभ होने लगे. 1970 के दशक के अंतिम दिनों में कुछ समूहों ने मिलकर इस कुत्ते की प्रजाति को बचाने का ज़िम्मा संभाला.
दिल्ली में पढ़ाई कर रही मोनिका भी नेटफ्लिक्स देखती हैं.
अपनी दिलचस्पी के बारे में वो कहती हैं, ''जब आप मुझसे बात कर रहे हैं, तब भी मैं 'द पनिशर' देख रही हूं. इन साइट्स में कुछ देखने की सबसे अच्छी बात ये है कि आप एक साथ सारे एपिसोड देख सकते हैं. एचबीओ की सिरीज़ गेम ऑफ थ्रोन्स या टीवी की तरह आपको महीनों तक इंतज़ार नहीं करना होता है. लेकिन पूरी सिरीज़ एक बार में मिल जाने से दर्शकों की जो बेचैनी होती है, वो नहीं होती.''
अक्षय कहते हैं, ''टीवी में अगर कहीं रोने का सीन आने वाला है और माहौल बन रहा है तो टीवी का विज्ञापन उस माहौल को तोड़ देता है. ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स में ऐसा नहीं है.''
अक्षय ने बताया कि अगर सिरीज़ अच्छी है या अवसाद वाले दिन हैं तो 5 से लेकर 10 घंटे तक भी देख साइट्स पर वक़्त गुज़रता है.
बाहर के देशों में ऑनलाइन गेमिंग को मेंटल हेल्थ कंडीशन मान लिया गया है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गेमिंग को डिसॉर्डर माना है. इसमें सिर्फ़ ऑनलाइन वेबसाइट्स ही नहीं, सोशल मीडिया भी शामिल है.
डॉक्टर मनोज बताते हैं कि बाहर के देशों में भारत की तरह इस पर रिसर्च हो रही है.
महाराष्ट्र का यवतमाल ज़िला और इस ज़िले का पांढरकावड़ा इलाका. ये क्षेत्र इन दिनों एक बाघिन (मादा टाइगर) की
वजह से परेशान है. इसका नाम है टी1, जो बीते कई दिनों से इस इलाके के
लोगों और जानवरों के लिए मौत बनकर घूम रही है.
हैरानी की बात है कि पिछले कई दिनों से वन विभाग इस बाघिन को पकड़ने के लिए दिन-रात एक किए हुए
है, लेकिन कामयाबी नहीं मिल रही. फ़ॉरेस्ट रेंजर गश्त लगा रहे हैं, बंदूकों
के साये में पहरेदारी चल रही है, लेकिन बाघिन चकमा दे रही है.प्रशासन ने अपनी कोशिशों के सिलसिले में सोमवार को एक और कड़ी जोड़ी है. इस बाघिन के शिकार के लिए केन कोरसो प्रजाति के दो कुत्तों को लगाया गया है. ये कुत्ते शिकारी माने जाते हैं.
ऐसा एक कुत्ता छह लाख रुपए का आता है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक ये दोनों कुत्ते हैदराबाद के शार्पशूटर नवाब शफ़त अली ख़ान के हैं, जो उनके पैलेस के बाड़े में रहते हैं.रिंसिपल चीफ़ कंज़रवेटर ऑफ़ फ़ॉरेस्ट (वाइल्डलाइफ़) ए के मिश्रा ने टाइम्स से कहा, ''काफ़ी विचार-विमर्श के बाद केन कोरसो कुत्तों को फ़ील्ड में लगाया गया है. गोल्फ़र और डॉग ट्रेनर ज्योति रंधावा इन कुत्तों को संभाल रहे हैं. नवाब के बेटे असगर समेत कुछ और लोग भी इस ऑपरेशन में शामिल हैं.''
अधिकारियों का कहना है कि बाघिन दो घोड़ों को मार चुकी है, लेकिन वो 'चारे' के क़रीब नहीं गई. इसके अलावा कैमरा ट्रैप में भी उसकी तस्वीरें नहीं आ रहीं. उसे बेहोश करने के लिए पहले बाघिन की लोकेशन का पता करना ज़रूरी है और कुत्ते उसे खोज निकालने में काफ़ी मदद दे सकते हैं.
लेकिन वो कुत्ता कौन-सा है, जिसे बाघिन या बाघ के सामने उतारा जा रहा है. क्या कुत्तों की सारी प्रजातियां इतनी दमदार हैं कि उन्हें टाइगर से भिड़ाया जा सकता है. ये केन कोरसो कहां से आए हैं और इतने बहादुर कैसे हैं?
केन कोरसो का नाम कहां से आया? केन का मतलब है कुत्ता और लातिन भाषा में कोरसो के मायने हैं सुरक्षा करने वाला या प्रोटेक्टर. इसे इटैलियन मास्टिफ़ भी कहा जाता है. इटली में ये कई साल से गार्ड डॉग की भूमिका निभा रहा है.
केन कोरसो को संपत्ति, पशुओं और परिवारों की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है और आज भी कई इलाकों में ये जारी है. इतिहास को देखें तो ये नाइट वॉचमेन की भूमिका निभाते रहे हैं.
अमेरिकन केनेल क्लब ल 1994 में इस प्रजाति को इटैलियन केनल क्लब ने इतालवी कुत्तों की 14वीं प्रजाति के रूप में मान्यता दे दी है. साल 1997 में वर्ल्ड केनाइन ऑर्गेनाइज़ेशन ने इसे आंशिक रूप से स्वीकार किया था और दस साल बाद इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह मान्यता दे दी गई.
अमरीका में अमरीकन केनेल क्लब ने पहले साल 2010 में केन कोरसो को मान्यता दी थी. इस प्रजाति की शोहरत लगातार बढ़ रही है और दुनिया के कई देशों में इसे पुलिस डॉग के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है.
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के मुताबिक इन कुत्तों का कद 25 से 28 इंच होता है और जीवनकाल 9-12 साल. इन कुत्तों का वज़न 45-50 किलोग्राम तक होता है.
इन कुत्तों को स्मार्ट, ट्रेनिंग देने के योग्य, दबंग और आत्मविश्वास से भरा हुआ बताया जाता है. केन कोरसो का इतिहास रोमन दौर से जुड़ा है. इसका सिर काफ़ी बढ़ा होता है
20वीं सदी में दक्षिणी इटली के ग्रामीण फ़ार्म में जब जीवन में बदलाव हुआ तो कोरसो दुर्लभ होने लगे. 1970 के दशक के अंतिम दिनों में कुछ समूहों ने मिलकर इस कुत्ते की प्रजाति को बचाने का ज़िम्मा संभाला.